Tuesday, May 9, 2023

 The Divine Truth of Hinduism: One Ishwar is the source of all powers and the ultimate benefactor of all living beings. Ishwar witnesses every thought and gives us the power to think coherently. Ishwar has no mortal attribute. What is the power to think coherently? See next post!

Sunday, May 7, 2023

The divine truth of Hinduism: Vedas say that One all-pervasive Ishwar with a minute replica of divinity called Atma resides in the body of every creature Sita-Ram, Radha-Krishna, and Shiv-Parwati are forms of one divinity but different reflections for different tastes of devotion

Saturday, July 10, 2021

 दिनांक २९ अप्रेल २०२१ को डॉ. कुंवर बेचैन का निधन हो गयाl उनके निधन से हिंदी कविता और ग़ज़ल का मंच बहुत निर्धन हो गयाl उनकी प्रतिभा असीम थीl माँ सरस्वती की उनपर असीम कृपा थीl ७९ वर्ष की आयु में भी मंच पर उनका युवाओं जैसा उत्साह दिखता थाl वह मंच पर न केवल सुनाते थे बल्कि अन्य सभी ,युवा तथा वरिष्ठ कवियों और शायरों की रचनाएँ ध्यान से सुनते थे और नोट भी करते थेl उनका विचार भारत के काव्य मंच का इतिहास लिखने का थाl 
व्यक्तिगत रूप से वह आकर्षक व्यक्तित्व, बुलंद आवाज़ और मधुर गायन कला से संपन्न थेl अद्बभुत चित्रकार थे और बांसुरी बहुत सुन्दर बजा लेते थेl सौम्य, विनयशील, बहुत ही सज्जनl हम जब उनके घर उनके साथ भोजन करने बैठते थे तो सभी साथ खाने वालों को वह पहला कौर अपनी थाल से अपने हाथ से खिलाते थेl 

मंच पर जब कविता सुनाने खड़े होते तब न केवल सभी कवियों वरन् जान पहचान के श्रोताओं का भी अभिनन्दन करतेl 

उनकर गृह नगर गाज़ियाबाद में संकेत नाम की संस्था की स्थापना में अन्य बड़ी हस्तियों जैसे एम् एम् एच कोलेज के प्रिंसिपल डॉ. बी बी सिंह, मेरठ विश्वविद्यालय के भूतपूर्व वाइस चांसलर के बी एल गोस्वामी, प्रसिद्ध समाज सेविका श्रीमती मंजीत भाम्बरा आदि के साथ मैं भी सम्मिलित था तब डॉ. बेचैन के निकट आने का अवसर मुझे मिला थाl उनकी जीवन यात्रा अत्यन साधारण, सुविधाओं से वंचित बाल्यकाल से आरंभ होकर अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कवि तथा शायर के रूप में सिद्ध एवं प्रसिद्ध होने की एक अद्भुत व् रोचक कथा हैl  

डॉ. बेचैन ने लगभग सभी छंदों में गीत, लगभग सभी  बह्र में ग़ज़ल, नवगीत, कवितायेँ , हाइकू, दोहा संग्रह, "मरकत द्वीप की नीलमणि" नामक उपन्यास व् "पांचाली" नमक खंडकाव्य भी लिखे। 
'पिन बहुत सारे', 'भीतर साँकलः बाहर साँकल', 'उर्वशी हो तुम, झुलसो मत मोरपंख', 'एक दीप चौमुखी, नदी पसीने की', 'दिन दिवंगत हुए', 'ग़ज़ल-संग्रह: शामियाने काँच के', 'महावर इंतज़ारों का', 'रस्सियाँ पानी की', 'पत्थर की बाँसुरी', 'दीवारों पर दस्तक ', 'नाव बनता हुआ काग़ज़', 'आग पर कंदील', जैसे उनके कई ग़ज़ल संग्रह हैं तथा 'नदी तुम रुक क्यों गई', 'शब्दः एक लालटेन' आदि कविता संग्रह हैं।
उनका एक शेर मेरे मन में सदैव गूंजता है:
सारी धरा भी साथ दे तो और बात हैl पर तू ज़रा भी साथ दे तो और बात हैll 
चलने को एक पाँव से भी चल रहे हैं लोगl पर दूसरा भी साथ दे तो और बात हैll 
आज उनकी एक कविता भी याद आ रही है जिसकी दो पंक्तियाँ हैं;
आती जाती सांस दो सहेलियां हैं,
एक जा के दूसरे को भेज जाती हैl 
और जिस गली में उनका आना जाना है,
फूस की वो झोपड़ी जीवन कहाती हैl 
उनको विनम्र श्रद्धांजलि के रूप में उनके काव्य गुरु श्री कृष्ण बिहारी "नूर" लखनवी का एक शेर प्रस्तुत करता हूँ; 
अपनी रचनाओं में वो ज़िंदा हैl 
"नूर" इस दुनियां से गया ही नहींll 


Saturday, July 14, 2012

बह्र Bahr

अब हम थोड़ी चर्चा बह्र की करेंगे।इसमें जो ग़लतियाँ हैं वह मेरे ठीक ठीक न समझ पाने के कारण हैं, पूरी जानकारी के लिए डा कुंवर बेचैन की किताब "ग़ज़ल का व्याकरण " पढ़ें।
ग़ज़ल दो प्रकार की हो सकती हैं,
1. जिनमें पूरी ग़ज़ल में एक ही मौजूं अथवा विषय हो, जैसे किसी व्यक्ति व परिस्थिति पर - इसे मुसलसल ग़ज़ल कहते हैं।
2. जिसमें हर शेर आजाद होता है, इसे ग़ैर मुसलसल ग़ज़ल कहते हैं।
ग़ज़ल रुक्न यानि वज़न जो गुनगुनाहट का अंदाज़ है, उस की लय पर कही जाती है। रुक्न का बहुवचन अर्कान  है। अतः हर ग़ज़ल में गुनगुनाने लायक कुछ  अर्कान होते है। जैसे 
"फायलातुन  फायलातुन फायलातुन फायलुन"  इसमें फायलातुन एक रुक्न है। रुक्न के टुकड़े जुज़ कहलाते हैं व हर टुकड़े का एक वज़न होता है। जैसे फायलातुन में बड़ी मात्रा वाले टुकड़े का वज़न गाफ यानी गुरु कहलाता है तथा छोटी मात्रा वाला टुकड़ा लाम यानी लघु कहलाता है। लाम-गाफ का संयोजन वज़न कहलाता है। वज़न भार नहीं है बल्कि गुनगुनाने का अंदाज़ है। अतः 12 (लाम-गाफ) का वज़न तीन नहीं है बल्कि ल-ला है। 
अर्कान के वज़न के हिसाब से ही शेर कहा जाता है। शेर की पहली पंक्ति (मिसरा-ए - ऊला) की पहली रुक्न को सदर व आखरी रुक्न को उरूज़ कहते हैं। शेर की दूसरी पंक्ति (मिसरा-इ-सानी ) की पहली रुक्न को इब्तिदा व आखरी रुक्न को ज़रब कहते हैं। दोनों पक्तियों की बीच के सभी अर्कान हश्र कहलाते हैं। सालिम बह्र यानी शुद्ध  बह्र । मात्रा घटाने यानी ज़िहाफ करने से बनने वाली बह्र मुज़ाईफ कहलाती है। एक ही बह्र लेकर शेर कहने को, चाहे अर्कान सालिम हो अथवा मुज़ाईफ; मुफ्रद बह्र  तथा मिश्रित बह्र लेकर शेर कहने को मुरक्कब बह्र कहते है। बह्र व समंदर के हिज्जे उर्दू में एक ही है। यानी बह्र की दुनियां भी एक समंदर है, विशाल, अंतहीन। कुछ और चर्चा अगली पोस्ट में।

Saturday, June 9, 2012

गजल (कविता)की रचना Creation of Poetry


अब पिछली पोस्ट में लिखे निम्न नियम के आधार पर गजल की रचना समझते हैं। नियम यह हैं:

1. सबसे पहले गद्य के जितने निकट हो सके ऐसे पद्य की भाषा में लिखो,
2. मोह त्याग कर अर्थ भाव व अंतर्संबंध देखो,
3. काफिया ठीक करो,
4. रदीफ़ संभालो,
5. तकतीअ  करो व मात्राएँ दुरुस्त करो,
6. बहर में करो,  तगज्जुल या रवानी देखो 
7. फिर ग़ज़ल कहो

काफिया और रदीफ़ की चर्चा  4 मई की पोस्ट में की जा चुकी है। अब बाकी बातें।

गद्य के निकट पद्य जैसे मिर्ज़ा ग़ालिब का शेर:
"दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है। आखिर इस दर्द की दवा क्या है।। " इससे बेहतर उदाहरण क्या होगा!
अब देखें डा. कुंवर बेचैन के दो शेर:-
दो चार बार हम जो जरा हँस हँसा लिए। सारे जहां ने हाथ में पत्थर उठा लिए।।
रहते हमारे पास तो ये टूटते जरूर। अच्छा किया जो आप ने सपने चुरा लिए।।

मोह त्याग कर अंतर्संबंध देखना:
दो शेर मुलाहिजा फरमाइए:
इक उम्र तेरे प्यार में करके तमाम चल दिए। पर दोस्त तेरे दिल में भी करके मुकाम चल दिए।।
यारों सफ़र में होंठ कभी खुश्क भी होंगे। लो अश्के चश्मे नम का करके इंतजाम चल दिए।।
प्रश्न है कौन चल दिया? फिर दोहराव है - अश्क व चश्मे नम एक ही बात है।
तो यह शेर कुछ यूं बने:
इक उम्र तेरे प्यार में करके तमाम चल दिए। पर दोस्त तेरे दिल में भी करके मुकाम चल दिए।। 
सोचा सफर में होंठ भी हो जायेंगे कुछ खुश्क। लो चश्मे नम का हम तो करके इंतजाम चल दिए।।
अभी बहुत कुछ बाकी है। तख्ती करनी है, मात्राएँ समझनी हैं, बहर या गजल का वज़न देखना है, तगज्जुल पहचानना है। फिर कभी!

Thursday, June 7, 2012

ग़ज़ल कहना सात कदम

डा. कुंवर बेचैन बताया कि ग़ज़ल अथवा कविता मनः स्थिति का प्रवाह होती है। भीतर यदि लय है तो प्रत्येक मनः स्थिति - सुख दुःख, टूटन व घुटन भी कविता हो सकती है। किन्तु यदि भीतर बिखराव या confusion है तो मन कविता  नहीं दे सकता। ग़ज़ल के शेरों में तगज्जुल अथवा रवानी आवश्यक है। ग़ज़ल के प्राण हैं कि यदि काफिया छोड़ कर वही बात गद्य में कही जय तो भी कमोबेश उसी रूप में रहे अतः शेरों को बातचीत की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। जैसे: -
दिले नादां तुझे हुआ क्या है। आखिर इस दर्द की दवा क्या है।।
ग़ज़ल का हर शेर आजाद होना चाहिए, ग़ज़ल लिखने के बाद उसके अर्थ भाव व अंतर्संबंध "मोह" त्याग कर देखने चाहिएं मोहित होने पर आकलन असंभव हो जाता है। ग़ज़ल की मात्राएं सही करने को  तकतीअ  करना कहते हैं। 

अतः ग़ज़ल रचना का नियम यह हुआ:-
1. सबसे पहले गद्य के जितने निकट हो सके ऐसे पद्य की भाषा में लिखो,
2. मोह त्याग कर अर्थ भाव व अंतर्संबंध देखो,
3. काफिया ठीक करो,
4. रदीफ़ संभालो,
5.  तकतीअ  करो व मात्राएँ दुरुस्त करो,
6. बहर में करो,  तगज्जुल या रवानी देखो 
7. फिर ग़ज़ल कहो 
ग़ज़ल कही जाती है, अर्ज़ की जाती है, सुने नहीं। 
यह कैसे किया जाता है? यह फिर कभी। 
अभी यह सात कदम!  

Monday, May 7, 2012

काव्य शास्त्र संक्षिप्त निरूपण

डा. कुंवर बेचैन ने आगे बताया कि कलाकार की प्रथम क्षमता भाव का आनंद लेने की हो तत्पश्चात कलाविशेष की प्रतिभा व व्युत्पत्ति का अभ्यास किया जाय, कुछ परिभाषाएं जो उन्होंने बताई वे निम्नांकित हैं:
कविता - गद्य से हटकर तुकांत या अतुकांत रचना सामान्य रूप से कविता कहलाती है। 
गीत - जो गाया जासके वह गीत कहलाता हैं जैसे फिल्मी गीत "बैठ जा बैठ गई, खड़ी हो जा खड़ी हो गई।"
काव्य, Lyric - जो कागज़ पर भी गीत हो जिसकी अंतर्ध्वनियां एक structure के नियमों का पालन करती हों।
काव्य दो प्रकार के होते हैं - 
1. प्रबंध काव्य 
2. मुक्तक काव्य 
प्रबंध काव्य 
जैसे 1 महाकाव्य, 2 खंड काव्य, 3 एकार्थ काव्य
प्रबंध काव्य का विषय कोई संज्ञा होती है जैसे दिनकर की राम की शक्ति पूजा , महाकाव्य सम्पूर्ण अथवा जीवन पर्यंत का विवरण जैसे तुलसी दास की राम चरित मानस, खंड काव्य में केवल एक घटना विशेष का वर्णन होता है यथा श्याम नारायण पाण्डेय की हल्दी घाटी, एकार्थ काव्य में एक subject होता है जैसे जय शंकर प्रसाद की कामायनी। 
मुक्तक काव्य 
जो प्रबंध काव्य न हो।
बंद  - गीत का अन्तरा 
छंद - काव्य नियम का पालन करती रचना यथा वर्णिक, मात्रिक व बहर।
नज़्म - नज़्म एक विषय को लेकर कही ग़ज़ल होती हा जैसे मर्सिया (हज़रात इमाम हुसैन की कर्बला में कुरबानी), मसनवी (कोई दास्ताँ जैसे हीर राँझा), कसीदा जैसे किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति की शान में कही गई ग़ज़ल, नज्म छोटी व बहुत बड़ी किसी भी रूप में हो सकती है। 
 रुबाई - चार मिसरों (पंक्तियों) की रचना। इन मिसरों में रब्त या अंतर्संबंध होता है। काफिया पहली, दूसरी व चौथी पंक्ति में होता है व कोई भी मिसरा आजाद नहीं होता। 
ध्यान रहे की अगर बहर भी हो और रदीफ़ भी हो तो भी अगर काफिया न हो तो तो काव्यात्मक व गाने योग्य होने पर भी किसी रचना  को  ग़ज़ल नहीं कहा  जा  सकता। काफिया ग़ज़ल में छड़ी लेकर खड़ा रहता है और शायर का ख़याल ही बदलवा देता है।
शेष फिर, पहले एक रुबाई :
कुछ देर तक ये माना सताता है इंतज़ार,
या यूँ कहें के दिल को जलाता है इंतज़ार। 
कुछ वक़्त इसके साथ गुज़ारा तो ये जाना,
कितना  करीब खुद के ये लाता है इंतजार।।


Saturday, May 5, 2012

मनगढ वारो रसिया The Rasik Saint of Mangadh

मनगढ एक गाँव है, तहसील कुंडा, जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश में,  कुंडा हरनामगंज  रेलवे स्टेशन निकट है ,  यह स्थान इलाहाबाद, प्रयाग व श्रुन्ग्वेरपुर (जहाँ केवट ने रामावतार में भगवन श्रीराम के चरण धोये थे) का  निकटवर्ती है। वहां जन्म लिया है  एक रसिक संत ने। जिनके लिखे रसिया मुझे प्राण प्यारे हैं। उन्हींके रसिया पर आधारित उन्हींपर यह रसिया लिखा गया है। वह कौन हैं?वे मेरे कौन हैं? वह आप के लिए क्या हो सकते हैं इसी को बतलाने के लिए यह ब्लॉग लिखा जा रहा है। फिलहाल यह रसिया:
मन राधे गोविन्द बन छायो रे, मनगढ़ वारो रसिया।
           छवि प्रथम दरस महं मन मोहे,
            दृग मिलतहिं हृदय कसक होवे,
दिव्य वाणी से मन को लुभायो रे, मनगढ वारो रसिया। 
           दियो ऐसो दुर्लभ दिव्य ज्ञान, 
           सके कोऊ न बिन इन कृपा जान,   
 ब्रज रस सों मन महाकायो रे मनगढ वारो रसिया। 
             हो व्याकुल रूप-ध्यान साधे,
              साधक जन भज  राधे राधे,
राधे नाम हर मन में बसायो रे मनगढ वारो रसिया। 
             मूरख सोचें ज्यादा या कम, 
             गुरु किरपा तो सब पर है सम,
निष्काम प्रेम समझायो रे मनगढ वारो रसिया,
             जो दिव्य प्रेम हरदम लुटाय,
             अरु युगल प्रेम की लौ लगाय,
राधे गोविन्द गोविन्द गयो रे मनगढ वारो रसिया। 

अब एक दोहा:
सद्गुरु बांटें प्रेमरस पग पग पे छल्कायं।
जो इनतक पहुंचे उसे नैनन शहद पिलायं।।
 

भविष्य The Future

कुछ समय बाद भविष्य चेतना के रंगमंच पर एक रचना का निर्माण होगा  व मनः प्राण इस रचना पर नर्तन करेंगे:-
दिव्य बदन गौर वरण षोडशी श्री राधे।
अरुण चरण पल्लव वरण  ध्यान ह्रदय सोहे। 
छन छननन धुनी विछुवन रसिकन मन मोहे।
पायल की रुन  झुन धुन ध्यान जग भुलादे।। 1।।
दिव्य बदन ..........
रत्न जड़ित नीलाम्बर विद्युत् आभा लुटाय ।
अंगुरिन मुन्दरिन कि ज्योति गोविन्दहु हिय चुराय।
कर कंकन बाजुबंद अमित छवि अगाधे ।।2।।
दिव्य बदन..........
मुख मंडल गोल भाल कुमकुम को तिलक लाल। 
भौंहन की मोहन छवि नैना दुइ अति विशाल।
कुंतल की श्याम राशि ध्यान हृदय साधे ।।3।।
दिव्य बदन ............
श्रुति कुंडल अधर लाल शुभ कपोल मृदु रसाल। 
सुगढ़ नासिका ग्रीवा, चिबुक छवि लाखे गुपाल।
मुकुट हार सौगंधिनि रसित छवि दिखादे ।।4।।
दिव्य बदन .............
 




 

Friday, May 4, 2012

ग़ज़ल Ghazal

डा. कुंवर बेचैन से कई बार मिलना हुआ हर बार  वह मुझे कुछ लिखने को प्रेरित करते रहे. कुछ समझ नहीं आ रहा था  कि क्या लिखूं . डा. साहब ने कहा की तुम ग़ज़ल लिखो. मैंने कहा कि  मैं तो ग़ज़ल के बारे में कुछ जनता ही नहीं. उन्होंने कहा अपने मन के भाव लिख कर लाओ. अंततः कुछ लिखने की हिम्मत जुटी. एक शेरनुमा कुछ लिख डाला:
लोगों पर तुम ध्यान न देना चर्चा करेंगे ज्यादा से ज्यादा।
मेरे तुम्हारे रिश्ते पर कुछ बातें करेंगे ज्यादा  से ज्यादा। । 
आज के दौरे सितमगरी पर क्या क्या हम पर जुल्म न होंगे ।  
लोग तुम्हें भी बह्कायेंगे बारे में मेरे ज्यादा से ज्यादा । । 
लेकर गया डा. साहब के पास. तारिख थी 3 मार्च 1996. डा. साहब ने देखा और कहा की ग़ज़ल में सात बातें मुख्य हैं:
1. शेर 2. मिसरा 3. मत्तला 4. मकता 5. रदीफ़ 6. काफिया और 7. बहर
ग़ज़ल कुछ अशआर (शेर का बहुवचन ) से मिलकर बनती है। या यों कहें की एक काफिया और रदीफ़, एक बहर के चंद अशआर को जिनकी संख्या पांच, सात आदि हो से साथ पढ़े जाने को ग़ज़ल कहते हैं. एक शेर  में दो मिसरे या पंक्तियाँ होती हैं. काफिया तुकांत को कहते हैं तथा रदीफ़ वह शब्द या वाक्यांश है हो ग़ज़ल के पहले शेर जिसे मत्तला में दोनों मिसरों के अंत में तथा अन्य शेरों 
में दूसरे  मिसरे के अंत में आता है.  बहर मोटे तौर पर दोनों मिसरों में मात्राओं के सामान होने को कहते हैं, इसकी कुछ बारीकियां कुछ देर बाद बतलाऊंगा. मकता आम तौर पर ग़ज़ल के आखरी शेर  को कहते हैं जिसमें शायर अपना नाम देता है. पहले तुम्हारे मत्तले को सुधारते हैं. उस्ताद द्वारा सुधार किये जाने को इस्लाह कहते हैं.
तुम्हारा रदीफ़ है "ज्यादा से ज्यादा"  काफिया "चर्चा करेंगे " से मिलना चाहिए 
मत्तले के दूसरे मिसरे का काफिया "बातें करेंगे" पहले मिसरे "चर्चा करेंगे " से मेल नहीं खाता है. इसी प्रकार दूसरे शेर के दूसरे मिसरे का काफिया "बारे में मेरे" भी तंग है अर्थात बेमेल है. अब इसे ठीक करते हैं:
 लोगों पर तुम ध्यान न देना चर्चा करेंगे ज्यादा से ज्यादा।
हम क्या हैं और तुम क्या हो यह सोचा करेंगे ज्यादा से ज्यादा।।
आज के दौरे सितमगरी पर क्या क्या हम पर जुल्म न होंगे ।  
लोग तुम्हें भी बह्कायेंगे रुसवा करेंगे ज्यादा से ज्यादा।।
कुछ कुछ मुझे समझ में आने लगा. लेकिन यह तो डा. साहब की शिक्षा शुरुआत थी. इस दिन को तो बहुत लम्बा और अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होना था. यह बात कुछ समय बाद.

 

Wednesday, May 2, 2012

काव्य जीवन Poetic Training

मेरा तथाकथित काव्य पाठ समाप्त हुआ, मैं नर्वस था, यह भी भूल गया कि मैं कहाँ बैठा था। उसी समय डा.  कुंवर बेचैन की आवाज़ आई - बाजपेयी जी आप यहाँ मेरे पास बैठिये। बैठ गया मैं जाकर डा. कुंवर बेचैन के पास। उपनाम उनका बेचैन था लेकिन बेचैन था मेरा मन। डा. साहब ने कहा  बाजपेयी जी  आप तो बहुत अच्छा लिखते हैं! कब से लिख रहे हैं? मैंने सोच कि दाई से भी कहीं पेट छुपता है और कह दिया की कुछ बेतुकी रचनाएँ यूही मन बहलाव के लिए कभी कभी लिखता रहा हूँ। इससे अधिक न मुझे कुछ आता है न कभी कुछ सीखा। विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूँ , साहित्य की कुछ बैक ग्राउंड नहीं है। डा. साहब ने कहा कुछ भी हो आप  के विचार व उनका प्रकटीकरण बहुत अच्छा है। आप अच्छा लिख सकते हैं। एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार ने उत्साह बढाया वह भी पहली रचना पर! नर्वसनेस कुछ कम हुई। फिर देखा कई लोगों ने, साहित्यकार, पत्रकार व अन्य सम्मानित व्यक्तियों ने भी आकर बधाई दी। अब मैं नार्मल सा हो गया। डर समाप्त हो गया। उस समय से आज तक सदैव डा. कुंवर बेचैन का सहयोग मिलता रहा है। बहुत परिश्रम किया है उन्हों ने मेरे लिये। वह बात भी लिखूंगा। अभी उनके एक शेर से टाइपिंग को विश्राम देता हूँ:
सारी  धरा भी साथ दे तो और बात है , पर तू ज़रा भी साथ दे तो और बात है। 
चलने को एक पाँव से भी चल रहे हैं लोग, पर दूसरा भी साथ दे तो और बात है।।

Monday, April 30, 2012

काव्य जीवन Life as Poet

1996, होली से पूर्व की घटना है. मिसेस भाम्भ्रा ने एक दिन कहा कि प्रदीप जी होली मिलन का कार्यक्रम है, काफी लोग आ रहे हैं आप भी आ जाना लेकिन कुछ सुनाने को तैयार रहना. गायन का तो कुछ रियाज़ भी नहीं था. कुछ प्रयास करता तो हंसी उड़वाने वाली बात होती इसलिए एक अतुकांत कविता लिख डाली. अतुकांत इसलिए कि तुकांत कविता, छंदों आदि का कुछ ज्ञान तो था नहीं. कविता कुछ यूँ थी:
ऐ मेरे बच्चे
मैंने तुम्हें कुछ रंग दिए थे 
और कहा था रंग कीमती हैं 
संभल कर इस्तेमाल करना इन्हें
व्यर्थ न बहाना 
और अगर 
समझ न आये इस्तेमाल तो
तो मेरी और देखना 
और देखना मेरी रचनाओं को 
तब तुम रंगों का इस्तेमाल 
रचनाओं कि देखभाल 
उन्हें संभालना 
निखारना 
सीख जाओगे 
देख लिया होता 
तो मेरे कुछ
अधूरे चित्रों में 
कुछ और रंग भरे होते
और कुछ रंगों के इस्तेमाल 
शायद कुछ कम किये होते
अब भी रुक जा
लाल हरे पीले रंग
कुछ कम बहा, कुछ बचा 
रंगों के सीधे, सच्चे 
इस्तेमाल का मौका 
आज
होली ही तो है
इस हथियार से लैस मैं पहुँच गया होली मिलन के कार्यक्रम में.वहां देखा तो काफी संगीतकार, गायक, शायर, कवि व् अन्य कई प्रकार के कलाकार भी आये थे. मिलाया गया मुझे उन सब से. एक सज्जन से मुलाकात करवाई गई - आप हैं डा. कुंवर बेचैन, मशहूर कवि, सहायक व साहित्यकार, एम् एम् एच कालेज में हिंदी के प्रोफेसर हैं. मेरे तो हाँथ के तोते उड़ गए व अपनी रचना का फटीचरपना याद आया. उसी समय पुकार लगी - अब आप के सामने आ रहे हैं श्री प्रदीप वाजपेयी, जो आप को अपनी एक रचना सुनायेंगे! लोग सावधान हो गए. मैं नर्वस हो गया. अब कोई चारा भी नहीं था. मरता क्या न करता? जैसे तैसे कर के सुनाना शुरू किया. कुछ आवाज़ में दम भर कर के. ताकि रचना कि कमी आवाज़ में छुप जाये. उम्मीद तो कम थी लेकिन उम्मीद पर ही दुनियां कायम है.
     

Sunday, April 29, 2012

शहर हिल मिल गया The City Becomes Freidly

मिसेस भाम्भ्रा ने कई लोगों से मिलवाया. सर्कल बढ़ता गया. शहर के साहित्यकारों, संगीतज्ञों, पत्रकारों आदि से भेंट हुई, कई गायन, वादन आदि प्रतियोगिताएं में जज बनने लगा.  लेकिन संगीत के नाम पर मुझे उतना भी नहीं आता था जितना उन बच्चों को जिनके कार्यक्रम में मैं जज बनता था. अतः तलाश थी किसी ऐसे की जो संगीत के बारे में कुछ तो बता दे. इसी बीच किट्टू को सैनुस की समस्या हुई, आफिस के एक सहकर्मी सुबिमल बैनर्जी ने डा. सोम नाथ बैनर्जी के बारे में बताया की वह होमियोपैथी के एक कुशल डाक्टर हैं उनको दिखा लो. उनसे कुछ दिनों किट्टू का इलाज चला, लाभ हुआ तो राज, मेरी पत्नी का भी इलाज कराया. भले आदमी थे, बुजुर्ग, लगभग 70 - 75 वर्ष  के किन्तु सुन्दर लाल सुर्ख चेहरा, मीठी वाणी, अच्छे होमियोपैथ. मिलना जुलना होने लगा तो पता चला कि पटियाला घराने के जगत प्रसिद्द गायक उस्ताद बड़े घुलाम अली खां के शिष्य हैं. इच्छ हुई कि इनसे कुछ जन लूं. लेकिन मन मौजी व्यक्ति थे. अतः हिम्मत नहीं होती थी. धीरे धीरे शास्त्रीय संगीत में अपनी रूचि जतलाई. सुन क्र खुश हुए लेकिन कुछ सुनाया अथवा बताया नहीं. आना जाना होता रहा. एक दिन शाम का समय था, मैं मिलने गया था, वर्षा होने लगी थी इसलिए कोई मरीज़ भी नहीं था. खुद ही कुछ गाने लगे, राग मल्हार में. मुझे बहुत भाया. मैंने प्रसंशा की तो कहने लगे की तुम भी कुछ सुनाओ. मैं ठहरा कोरा, कुछ हिचका फिर हिम्मत कर के कुछ सुनाया तो कहने लगे की तुम्हारी डीप सोनोरस वोइस है. तुम गा सकते हो. फिर कुछ दिनों के बाद खुद ही बोले मैं तुम्हें कुछ बताऊंगा. फिर शुरुआत हुई एक लम्बे कठिन रियाज़ की. जो लगभग दो वर्ष तक लगातार चला. मेरे लिए उन्होंने चुना राग भोपाली, खुद ही बंदिश बनाई -  स स ध  प ग रे स रे ध स रे ग रे ग, देखो देखो लोगों सब नन्द दुलाल को. ... कुछ थेओरी भी बताई. मेरा मन में संगीत भरने लगे. इधर उनकी आज्ञा से मैं सगीत प्रतियोगिताएं में जज बनना स्वीकार करने लगा. अब बारी थी डा. कुंवर बेचैन के मेरे जीवन में आने की.

Saturday, April 28, 2012

गाज़ियाबाद, भूमिका Preface

सन 1991 में मैं चंडीगढ़ से ट्रान्सफर होकर गाज़ियाबाद आया. मन बड़ा उदास था क्योंकि कहाँ चंडीगढ़ चंडीगढ़, साफ सुथरा शहर और कहाँ गाज़ियाबाद? अव्यवस्थित, गन्दा, झुग्गी झोपड़ियों से भरा, उस समय  यह शहर दिल्ली का एक अविकसित उपनगर मन जाता था. कुछ भी ढंग का खरीदना हो तो दिल्ली जाओ. यहाँ सब कुछ जैसा तैसा ही मिलेगा, कामचलाऊ. मुश्किल से किट्टू का एडमिशन हुआ सेंट मेरीस कान्वेंट में. घर किराये पर मिला, अनिल शर्मा का, पहली मंजिल का. उसके ऊपर कुछ न बना होने के कारण खूब गर्म. सोने चलो तो रात रात भर बिजली गायब! रुला दिया इस शहर ने! लेकिन धीरे धीरे शहर कुछ बदला. एक दिन ऑफिस के एक सहकर्मी ललित शर्मा ने कहा की मेरी एक सांस्कृतिक संस्था है ओस्कार नाम की, हम लोग स्कूल के बच्चों का एक डांस कम्पटीशन करने जा रहे हैं, क्या आप उनके जज बन सकते हैं. मैं ने मान लिया. उस डांस कम्पटीशन की एक और जज थीं मिसेस भाम्भ्रा उनसे मुलाकात हुई और फिर धीरे धीरे शहर मुआफिक आने लगा. बाक़ी किस्सा कुछ समय बाद.

Wednesday, April 25, 2012

मां दुर्गा Maan Durga

एक छोटा सा पद मां दुर्गा पर, विषय बाद में बताऊंगा:
दिव्य देह धारिणी,
जन दुर्गति हारिणी,
मनः क्लेश जारिणी,
परम शांति कारिणी,
प्रसीदतु हे मां दुर्गे,
मम हृदय विहारिणी. 

Tuesday, April 24, 2012

एक पद A Pada


श्री महाराज जी की वाणी मुझपर कुछ ऐसा असर डालने लगी की मैं उन्हीं की भाषा में सोचने व रचना करने लगा, एक उदाहरण निम्नांकित है जिस से मेरी बात अधिक स्पष्ट हो जायगी-
जगद्गुरु अब मोकहुं अपनाव.
मिथ्याभिमान बसहि  उर भीतर, किरपा करहु मिटाव.
जस नाटकु मैं करहूँ जग जाहिर, मोको वैसा बनाव.
छेड़त पल छिन माया तुम्हरी ओको तनिक समझाव.
अन्तः करण होत नित मैलो, तुम्हीं सुच्छ बनाव.
निष्ठुर भावहीन उर भीतर अपनी भक्ति जगाव.
सुनहु कृपालु न आस आन ते, अब तुम्हीं अपनाव.

Friday, April 20, 2012

प्रथम प्रभाव The First Impression

मैं नहीं जनता कि मैं कैसे और क्यों श्री कृपालु जी महाराज से प्रभावित हुआ. मैं तो अपने को एक नास्तिक मानता आया था. हाँ यह अवश्य था कि मुझे ज्ञान की खोज थी. हर प्रकार के ज्ञान की. चाहे वह संगीत हो, नाटक, चित्रकारी अथवा कविता. सन 1996  में चंडीगढ़ से ग़ाज़ियाबाद ट्रान्सफर होने पर मैं बिलकुल खुश नहीं था. कहाँ चंडीगढ़, साफ, सुथरा, सुसंस्कृत लोग और कहाँ ग़ाज़ियाबाद! उस समय झुग्गी झोपड़ियों से भरा, क्रिमिनल एरिया. कम से कम संस्कृति के लिए तो ग़ाज़ियाबाद जाना ही नहीं जाता था. फिर किसी सभ्य व्यक्ति को उस शहर से भला क्या आशा होती? लेकिन जीवन में अत्प्रत्याशित मोड़ आना ही तो ज़िन्दगी कहलाती है! तो इस शहर ने एक नहीं कई अप्रत्याशित मोड़ दिखलाये जिसकी चर्चा धीरे धीरे होती रहेगी. अभी इतना ही.

Monday, August 4, 2008

Bhakti

Bhakti is supreme. In Bhagvatam Lord Krishna says - "I am slave to my Bhaktas. My Bhaktas have eaten my heart." He again says - "I walk behind my Bhaktas so that the dust of their feet risen by their walk may fall upon me; that would purify me. " He again says - "Nobody, not even my soul is as dear to me as my Bhaktas." In Ram Charita Manas Tulsi Das says -"Ram is all merciful, he always forgives a misdemeanour against Himself but anyone who hurts His Bhakta shall burn in the fire of His anger." There are tales of Ambrish in Bhagvatam and that of Jayant and Vibhishana in Ram Charita Manas to support it. These stories shall be told later on. Radhey Radhey.